11.4.22

S-107 क्या जाता जो

क्या जाता जो वीराँ ज़िन्दगी में कुछ देर को आ जाती,
वक्त-ए-आखिरी में कुछ लम्हों को रौनक तो आ जाती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-107

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...