17.4.22

Q-054 मयखाने भी अब

मयखाने भी अब मैं जाता नहीं,
फिर भी हर शाम ये कैसा ख़ुमार है।
धोखे खाकर भी ख़त्म होता नहीं,
न जाने "अजनबी" ये कैसा प्यार है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-054

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