23.4.22

G-007 मिलती है तसकीन

मिलती है तस्कीन दिल जला कर,
हुस्न की अदा है लड़ना इतरा कर।
 
कोई आला-ऐ-क़त्ल भी नहीं रखते,
जान ले लेते हैं महज़ मुस्कुरा कर।

खोजना भी नहीं पड़ता शिकार को,

वो खुद चला आता है सर झुका कर।


अपनी ज़ुबाँ को ज़हमत कौन दे,

इज़हार करते हैं नज़र झुका कर।


ख़ामोशी ग़ज़ब की, जवाब देते हैं,

पल्लू का कोना दांतों में दबा कर।


सामने आते नहीं, छुप भी जाते नहीं,

सलाम करते हैं दरवाज़े के पीछे जा कर।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-007

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