25.4.24

Q-165 खामोशियाँ आदत हो गईं हैं

ख़ामोशियां आदत हो गई हैं, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
तल्खियां सौगात बन गईं हैं, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
भुला चुके हैं हम ज़माने को और ज़माना हमें इतना, 
किसी अपने के ग़ैर हो जाने से अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-165

22.4.24

S-320 बहुत ही अच्छा किया

बहुत ही अच्छा किया जो मेरे दिल को तोड़ डाला तुमने,
कम्बख़्त को मुहब्बत भी बेवजाह होती जारही थी तुमसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-320

19.4.24

P-248 शायद पहचान सकेंगे

शायद पहचान सकेंगे अपनी एहमियत हम भी कभी,
औरों की तरह जब हो जाएंगे बेमुरव्वत हम भी कभी।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-248

15.4.24

P-247 जिस दिल का मुकाबला

जिस दिल का मुकाबला मैं करता था समंदर से
बाहर से है वैसा ही, पर अब टूट गया है अंदर से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-247

14.4.24

Q-164 गुब्बार देखते देखते

 गुब्बार देखते-देखते गुज़री ज़िन्दगी,
इतने सारे कारवां गुज़र गए यहां से।
कुछ फूल खिलते-खिलते मुरझा गए ,
बार-बार कौन शिकवा करे फ़िज़ां से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-164

P-246 अपनी ही खुशी हमसे

जब अपनी खुशी हमसे बर्दाश्त नहीं होती,
तो भला दूसरे लोग कैसे बर्दाश्त कर लेंगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-246

S-319 मोमबत्ती के सीने में

मोमबत्ती के सीने में धागा कब तक बचेगा,

भले देर सबेर से सही, वह जल कर रहेगा।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-319

13.4.24

S-318 ज़िन्दगी तो इतनी लंबी

ज़िन्दगी तो इतनी लंबी देदी, ऐ ख़ुदा, मगर
साथ "ज़िन्दगी" का इतना कम क्यों दे दिया?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-318

12.4.24

M-089 एहसान है अगर तेरी

एहसान है अगर तेरी दोस्ती, तो मत कर,
मुझे भी नहीं मरना तेरे एहसान से दब कर,
मैं भी मसरूफ़ हूँ अपनी ज़िन्दगी में यार,
अपना कीमती वक़्त मुझपर खर्च मत कर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-089

P-245 काश ! बेदिल होकर ही

काश ! बेदिल होकर ही मिलते हम आपसे,,
कमबख्त ये मुहब्बत तो न हुई होती आपसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-245

M-088 दोस्त बनके गुदगुदाती हैं

दोस्त बन कर गुदगुदाती हैं यादें,
होकर दुश्मन हमें सताती हैं यादें,
खत्म हो जाते हैं सब रिश्ते-नाते,
बस अच्छी बुरी रह जाती हैं यादें।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-088

S-317 मैं भूल गया हूँ उसे,

मैं भूल गया हूँ उसे, बस उसकी यादों को भुलाना बाकी है,
यादें भी भूल जाऊंगा उसकी, बस ख़ुद को मिटाना बाकी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-317

9.4.24

Q-163 सभी तो महरूम हैं

सभी तो महरूम हैं किसी न किसी बात से,
कहाँ  किसी को  मुकम्मल जहाँ मिलता है।
जितना साथ तुझको मिल गया "अजनबी",
उतना किसी अजनबी को कहाँ मिलता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-163

7.4.24

P-244 वक़्त ख़राब में

वक़्त खराब में क्या क्या नहीं होता,
कुछ बयां होता है कुछ बयां नहीं होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-244

6.4.24

Q-162 ज़िन्दगी में, न उसूलों

ज़िन्दगी में, न उसूलों की कोई कीमत,
न खिलखिलाते फूलों की कोई कीमत,
बड़े बेमुरव्वत खुश्क लोग होते हैं जिन्हें,
चरागों की, न उजालों की कोई कीमत।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-162

P-243 आंगन में जो रंगबिरंगे

आंगन में जो रंगबिरंगे पौधे लगाए थे मैंने,
वो आज बेरहम गर्मी से झुलसते पाए मैंने।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-243

S-316 आखिर में बस

आख़िर में बस मेरे ज़ख्मों को गिन लेना,
मैने हर ज़ख़्म पर एक ग़ज़ल लिक्खी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-316

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...