गुब्बार देखते-देखते गुज़री ज़िन्दगी,
इतने सारे कारवां गुज़र गए यहां से।
कुछ फूल खिलते-खिलते मुरझा गए ,
बार-बार कौन शिकवा करे फ़िज़ां से।
इतने सारे कारवां गुज़र गए यहां से।
कुछ फूल खिलते-खिलते मुरझा गए ,
बार-बार कौन शिकवा करे फ़िज़ां से।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-164
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