ख़ामोशियां आदत हो गई हैं, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
तल्खियां सौगात बन गईं हैं, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
भुला चुके हैं हम ज़माने को और ज़माना हमें इतना,
किसी अपने के ग़ैर हो जाने से अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
तल्खियां सौगात बन गईं हैं, अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
भुला चुके हैं हम ज़माने को और ज़माना हमें इतना,
किसी अपने के ग़ैर हो जाने से अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-165
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