24.12.23

S-300 शराब फिर भी

शराब फिर भी बेहतर है जो चढ़ कर उतर तो जाती है, 
आपकी ज़िद की तरह नहीं कि चढ़ जाए तो उतरती नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-300

19.12.23

S-299 कौन जाने कब बदल

कौन जाने कब बदल जाए रुख हवा का "अजनबी",
'अपनों' से 'गैर' बन गए लोगों के हाल भी पूछ लिया कर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-299

Q-148 ऐ हवाओं इधर से

ऐ हवाओं इधर से न गुज़रो, 
यहां इक दीवाने की राख़ पड़ी है।
ख़ाक़ हो गया था वो यहां,
आज बस उसकी याद पड़ी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-148


Q-147 यूँही कायम रहेगी

यूँ ही क़ायम रहेगी यह दुनियाँ,
तुम न रहे, तो कोई और होगा।
दौर आते हैं चले जाते हैं दोस्त,
आज ये, कल कोई और होगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-147

16.12.23

S-298 ख़्वाबों का क्या है

ख़्वाबों का क्या है, टूट जाने दो उन्हें "अजनबी",
फिर कभी देख लेना , रातें तो फिर भी आएंगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-298

15.12.23

M-081 एक रात ढलने से

एक रात  ढलने से रातें ख़त्म नहीं होतीं,
बात बन्द करने से बातें ख़त्म नहीं होतीं,
गुफ़्तगू का कोई सिलसिला रहे बाकी,
इतनी जल्दी मुलाकातें ख़त्म नहीं होतीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-081

P-232 "आत्म-ग्लानि", "आत्म-कुंठा"

"आत्म-ग्लानि",  "आत्म-कुंठा" को स्वीकार करने के बजाय दूसरों को ग़लत सिद्ध करना बड़ा अपराध है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-232

11.12.23

S-297 रफ़्ता-रफ़्ता वो किसी

रफ़्ता-रफ़्ता वो किसी के दिल का सामां हो गए

जाने कब शादी कर ली और, हम मामा हो गए।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-297

P-231 कमियां ही कमियां

कमियां ही कमियां ढूंढते हैं सभी लोग अपनों से गैर तक,
एक भी पा जाए तो इंसाँ को बुरा बना देते हैं सर से पैर तक।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-231

9.12.23

S-296 पहले तो लुटा दीं

पहले तो लुटा दीं हमने अनमोल खुशियां लोगों पर,
अब ख़ुद तरस रहे हैं एक मामूली सी ख़ुशी के लिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-296

8.12.23

Q-146 जिनकी नींव शको-शुब्हा

जिनकी नींव शको-शुब्हा पर खड़ी होती है।
उन रिश्तों के ढहने की फ़िक्र हर घड़ी होती है।
रोज़मर्रा आते रहते हैं आंधी तूफ़ाँ ओ ज़लज़ले,
उनसे बचाने में इनको मुश्किल बड़ी होती है।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-146

S-295 मुहब्बत का जज़्बा

मुहब्बत का जज़्बा मौजूद है तुझमें भी, मुझमें भी,
मगर फ़र्क है इतना सा, मैं मानता हूँ इसे, पर तू नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-295

S-294 बस जिये जा रहे

बस जिये चले जा रहे हैं हम  "अजनबी",
बिना जिये भी तो गुज़रती नहीं ज़िन्दगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-294

S-293 हम ख़ुद ही हो जाते

 हम ख़ुद ही हो जाते आपकी नज़रों से दूर,
आपने क्यूं उठाई ज़हमत नज़रंदाज़ करने की।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-293

S-292 कोई ग़म न होता

कोई ग़म न होता तुम्हारे दूर चले जाने का,
अगर जो तुम हमारे इतने नज़दीक न होते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-292

7.12.23

M-080 ले गया अहंकार

ले गया अहंकार सब रिश्ते-नातों को,
अवसरवाद की पोटली में लपेटकर।
पश्चाताप और कटु अनुभव ही बचे हैं, 
जीना पड़ेगा अब उन्ही को समेटकर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-080

5.12.23

P-230 बदल गए लोग,

बदल गए लोग, बदल गई दुनियाँ,
ऐ निष्ठुर साल अब तू भी बदल जा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-230

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...