16.12.23

S-298 ख़्वाबों का क्या है

ख़्वाबों का क्या है, टूट जाने दो उन्हें "अजनबी",
फिर कभी देख लेना , रातें तो फिर भी आएंगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-298

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...