मुहब्बत का जज़्बा मौजूद है तुझमें भी, मुझमें भी,
मगर फ़र्क है इतना सा, मैं मानता हूँ इसे, पर तू नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-295
मगर फ़र्क है इतना सा, मैं मानता हूँ इसे, पर तू नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-295
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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