27.7.22

T-023 हर परेशां

हर परेशां ज़िन्दगी अपनी सी  लगती है,
सुन लेता हूँ दास्ताने-दर्द जिस किसी की,
वो ज़िंदगी भी मुझे अपनी सी लगती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-023

26.7.22

S-163 दर्द से मेरा

दर्द से मेरा नज़दीकी रिश्ता है,
वह मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा है।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी"  S-163

22.7.22

S-162 कभी तो

कभी तो ऐसा भी कोई दौर आऐ,
पुकारूं तेरे हमनाम को, और तू आऐ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-162 

19.7.22

Q-073 कहीं जज़्बात

कहीं जज़्बात होते ही नहीं,
कहीं दरियाऐ-जज़्बात होते हैं।
कहीं आंसू बहते ही नहीं,
कहीं अश्कों के सैलाब होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-073

18.7.22

P-129 मेरी प्यारी पतंग

मेरी प्यारी पतंग उड़ रही थी मेरी डोर से,
कटकर अब उड़ती है किसी और की डोर से। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-129

M-038 कोई बग़ैर

कोई बगैर दवा के मर गया,
कोई दवा खाने से मर गया,
जो शख्स ज़िंदा बचा भी,
वो किसी बद्दुआ से मर गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-038

P-128 ज़िन्दगी बारबार

ज़िन्दगी बार-बार सिखाती है, हम ही नहीं सीखा करते,
दोनों में एक भी खुदगर्ज़ हो तो रिश्ते नहीं टिका करते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-128

8.7.22

S-161उस बेवफ़ा

उस बेवफ़ा की रुसवाइयों से बहुत घबराता हूँ मैं,
ग़मज़दा न समझ ले कोई  इसलिए मुस्कुराता हूँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-161

S-159 हमे मालूम है

हमें मालूम है आप न आएंगे कभी, मगर
हमें भी ज़रा अपनी हदे-इंतज़ार देखनी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-159

S-158 ज़िन्दगी

ज़िंदगी की परवाह करता हूँ तब,
एक नज़र तुम्हे देख लेता हूँ जब।
 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-158

6.7.22

P-126 मैं बदल देता

मैं बदल देता सारे जहाँ को अपने मुताबिक,
मगर मुझको जहाँ मुकम्मल मिला ही नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-126

4.7.22

S-157 मुझसे बेशक

मुझसे बेशक पीछा छुड़ा लोगे तुम,
पर ख़ुद से कैसे छुड़ा पाओगे तुम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-157

3.7.22

P-125 जुर्म ये था

जुर्म ये था कि बात सीधी सीधी कह दी थी हमने,
उसका सिला ये मिला ,बात ही बन्द कर दी उसने।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-125

P-124 सदा कुछ नहीं

सदा कुछ नहीं रहता, न गर्मी, न घमंड, न अकड़, 
और न एटीट्यूड, न रुआब, और ना ही "ज़िन्दगी" ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-124

P-123 देखना बस ये है

देखना बस ये है किसको कितनी मोहलत मिलती है, 
वरना क़र्ज़ तो यहां हर किसी को चुकाना पड़ता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-123

T-022 बिन कसूर ही

बिन कसूर ही कसूरवार ठहराया गया हूं मैं,
गर सच में कोई कसूर करूं तो उसको पकड़ना, 
जिसके द्वारा बारबार उकसाया गया हूँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-022

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...