बिन कसूर ही कसूरवार ठहराया गया हूं मैं,
गर सच में कोई कसूर करूं तो उसको पकड़ना,
जिसके द्वारा बारबार उकसाया गया हूँ मैं।
गर सच में कोई कसूर करूं तो उसको पकड़ना,
जिसके द्वारा बारबार उकसाया गया हूँ मैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-022
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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