आपके तो बदलते तेवर बहुत थे।
चाहा था बेगुनाही का सबूत दे दूं,
पर मेरे अल्फ़ाज़ बेअसर बहुत थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-150
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
बदल जाते हैं नज़ारे,बदल जाते हैं नज़रिए भी,
अजनबियों में भी 'अपने' नज़र आने लगते हैं।
हो जाती हैं नज़रें इनायत जब कभी गैरों पर,
'अपनों' में तमाम ऐब से नज़र आने लगते हैं।
नज़र की नज़ाक़त को समझना नहीं है आसां,
ढूंढते हैं किनको, कौनसे नज़र आने लगते हैं।
नज़र भी क्या चीज़ दी है खुदा ने "अजनबी",
कभी पास के लोग दूर के नज़र आने लगते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-019
वो मंज़र, वो नज़ारे नहीं रहे,
मगर याद उनकी अब भी आती है।
वो बातें, वो मुलाक़ातें न रहीं,
कानों में मगर आवाज़ अब भी आती है।
वो इंतज़ार, वो दिलकशी न रही,
यूं तो सुबह और शाम अब भी आती है।
वो घटाएं, वो बिजलियाँ न रहीं,
कहने को तो बरसात अब भी आती है।
ना रही चेहरे पर वो रौनक,"अजनबी"
गो फीकी सी मुस्कुराहट अब भी आती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-018
गर्मी चाहे कितनी भी कड़क पड़ ले,
कुछ लोग कलेजे पर ठंडक महसूस ही करेंगे।
बरसात चाहे कितनी भी गिर ले,
ख़ुश्क और बेजान से चेहरे रूखे-सूखे ही रहेंगे।
बहारें कितनी भी हरियाली फैला दें,
मगर कुछ लोग उसे फिर भी पतझड़ ही कहेंगे।
कितना भी सीधा सादा क्यों न हो कोई,
कुछ लोग उसे बंदा 'कॉम्प्लिकेटेड' ही कहेंगे।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" K-014
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...