23.1.24

Q-150 बेरुखी को भला

बेरुखी को भला क्यों ज़हमत दी,
आपके तो बदलते तेवर बहुत थे।
चाहा था बेगुनाही का सबूत दे दूं,
पर मेरे अल्फ़ाज़ बेअसर बहुत थे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-150

19.1.24

M-082 जब कभी मौन रहने

जब कभी मौन रहने की ज़िद सी हो जाती है।
खुलकर कहने की गुंजाइश कहीं खो जाती है।
नहीं बचते जब शब्द भावाभिव्यक्ति के लिए,
तो सांकेतिक चिन्हों की ज़रूरत सी हो जाती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-082

18.1.24

S-301 ज़िंदगी का आखरी

ज़िन्दगी का आख़री सबक पा चुके हैं हम,
नफ़रत के ऐसे दौर से गुज़रके आ चुके हैं हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-301

17.1.24

G-019 'नज़दीक' के लोग

'नज़दीक' के लोग धुंधले नज़र आने लगते हैं।
दूर के लोग 'करीब' के जैसे नज़र आने लगते हैं।

मुमकिन है ये बीनाई का हो कोई मसला, पर
माकूल चश्मे से ठीक से नज़र आने लगते हैं।

बदल जाते हैं नज़ारे,बदल जाते हैं नज़रिए भी,

अजनबियों में भी 'अपने' नज़र आने लगते हैं।


हो जाती हैं नज़रें इनायत जब कभी गैरों पर,

'अपनों' में तमाम ऐब से नज़र आने लगते हैं।


नज़र की नज़ाक़त को समझना नहीं है आसां,

ढूंढते हैं किनको,  कौनसे नज़र आने लगते हैं।


नज़र भी क्या चीज़ दी है खुदा ने "अजनबी",

कभी पास के लोग दूर के नज़र आने लगते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-019




 

G-018 वो दोस्त-एहबाब तो न रहे

वो दोस्त-एहबाब तो नहीं रहे,
पर ख़ुशबू-ए-दोस्ती अब भी आती है।

वो मंज़र, वो नज़ारे नहीं रहे,

मगर याद उनकी अब भी आती है।


वो बातें, वो मुलाक़ातें न रहीं,

कानों में मगर आवाज़ अब भी आती है।


वो इंतज़ार, वो दिलकशी न रही,

यूं तो सुबह और शाम अब भी आती है।


वो घटाएं, वो बिजलियाँ न रहीं,

कहने को तो बरसात अब भी आती है।


ना रही चेहरे पर वो रौनक,"अजनबी"

गो फीकी सी मुस्कुराहट अब भी आती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-018





11.1.24

K-014 ठंड चाहे कितनी भी

ठंड चाहे कितनी भी क्यों न पड़ ले,
कुछ लोग नफ़रतों की आग में जलते ही रहेंगे।

गर्मी चाहे कितनी भी कड़क पड़ ले,

कुछ लोग कलेजे पर ठंडक महसूस ही करेंगे।


बरसात चाहे कितनी भी गिर ले,

ख़ुश्क और बेजान से चेहरे रूखे-सूखे ही रहेंगे।


बहारें कितनी भी हरियाली फैला दें,

मगर कुछ लोग उसे फिर भी पतझड़ ही कहेंगे।


कितना भी सीधा सादा क्यों न हो कोई,

कुछ लोग उसे बंदा 'कॉम्प्लिकेटेड'  ही कहेंगे।


-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" K-014

4.1.24

Q-149 ख़ुदा करे 'उसकी'

ख़ुदा करे 'उसकी' दवाओं का असर न हो मुझपे,
ता-उम्र मैं 'उसका' बीमार बना रहना चाहता हूँ।
मुझसे छीन ना लेना इंतज़ार की घड़ियां, ऐ ख़ुदा,
मैं तो बस मुंतज़िर-ए-यार बना रहना चाहता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-149



3.1.24

P-234 जब जब कुछ अच्छे

जब जब कुछ अच्छे लम्हे आए हैं,
उसी वक़्त लोगों ने  मुंह बनाए हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-234

1.1.24

P-233 अब अच्छे दिनों

अब अच्छे दिनों की तमन्ना ही न रही, ऐ ज़िन्दगी,
कि बाद में बड़ा दर्द देतीं हैं ये अच्छे दिनों की यादें।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-233

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...