वो दोस्त-एहबाब तो नहीं रहे,
पर ख़ुशबू-ए-दोस्ती अब भी आती है।
पर ख़ुशबू-ए-दोस्ती अब भी आती है।
वो मंज़र, वो नज़ारे नहीं रहे,
मगर याद उनकी अब भी आती है।
वो बातें, वो मुलाक़ातें न रहीं,
कानों में मगर आवाज़ अब भी आती है।
वो इंतज़ार, वो दिलकशी न रही,
यूं तो सुबह और शाम अब भी आती है।
वो घटाएं, वो बिजलियाँ न रहीं,
कहने को तो बरसात अब भी आती है।
ना रही चेहरे पर वो रौनक,"अजनबी"
गो फीकी सी मुस्कुराहट अब भी आती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-018
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