17.1.24

G-018 वो दोस्त-एहबाब तो न रहे

वो दोस्त-एहबाब तो नहीं रहे,
पर ख़ुशबू-ए-दोस्ती अब भी आती है।

वो मंज़र, वो नज़ारे नहीं रहे,

मगर याद उनकी अब भी आती है।


वो बातें, वो मुलाक़ातें न रहीं,

कानों में मगर आवाज़ अब भी आती है।


वो इंतज़ार, वो दिलकशी न रही,

यूं तो सुबह और शाम अब भी आती है।


वो घटाएं, वो बिजलियाँ न रहीं,

कहने को तो बरसात अब भी आती है।


ना रही चेहरे पर वो रौनक,"अजनबी"

गो फीकी सी मुस्कुराहट अब भी आती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-018





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