'नज़दीक' के लोग धुंधले नज़र आने लगते हैं।
दूर के लोग 'करीब' के जैसे नज़र आने लगते हैं।
दूर के लोग 'करीब' के जैसे नज़र आने लगते हैं।
मुमकिन है ये बीनाई का हो कोई मसला, पर
माकूल चश्मे से ठीक से नज़र आने लगते हैं।
बदल जाते हैं नज़ारे,बदल जाते हैं नज़रिए भी,
अजनबियों में भी 'अपने' नज़र आने लगते हैं।
हो जाती हैं नज़रें इनायत जब कभी गैरों पर,
'अपनों' में तमाम ऐब से नज़र आने लगते हैं।
नज़र की नज़ाक़त को समझना नहीं है आसां,
ढूंढते हैं किनको, कौनसे नज़र आने लगते हैं।
नज़र भी क्या चीज़ दी है खुदा ने "अजनबी",
कभी पास के लोग दूर के नज़र आने लगते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-019
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