बेरुखी को भला क्यों ज़हमत दी,
आपके तो बदलते तेवर बहुत थे।
चाहा था बेगुनाही का सबूत दे दूं,
पर मेरे अल्फ़ाज़ बेअसर बहुत थे।
आपके तो बदलते तेवर बहुत थे।
चाहा था बेगुनाही का सबूत दे दूं,
पर मेरे अल्फ़ाज़ बेअसर बहुत थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-150
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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