19.1.24

M-082 जब कभी मौन रहने

जब कभी मौन रहने की ज़िद सी हो जाती है।
खुलकर कहने की गुंजाइश कहीं खो जाती है।
नहीं बचते जब शब्द भावाभिव्यक्ति के लिए,
तो सांकेतिक चिन्हों की ज़रूरत सी हो जाती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-082

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