जब कभी मौन रहने की ज़िद सी हो जाती है।
खुलकर कहने की गुंजाइश कहीं खो जाती है।
नहीं बचते जब शब्द भावाभिव्यक्ति के लिए,
तो सांकेतिक चिन्हों की ज़रूरत सी हो जाती है।
खुलकर कहने की गुंजाइश कहीं खो जाती है।
नहीं बचते जब शब्द भावाभिव्यक्ति के लिए,
तो सांकेतिक चिन्हों की ज़रूरत सी हो जाती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-082
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