1.1.24

P-233 अब अच्छे दिनों

अब अच्छे दिनों की तमन्ना ही न रही, ऐ ज़िन्दगी,
कि बाद में बड़ा दर्द देतीं हैं ये अच्छे दिनों की यादें।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-233

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...