29.9.23

PP-223 ज़रूरी नहीं

ज़रूरी नहीं खिलौने में ही कोई नुक्स हो "अजनबी",

अक्सर खेलने वाला ही ऊब जाता है खिलौने से।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-223




28.9.23

M-074 चलो तुम्हे हम एक

चलो तुम्हे हम एक ख़ुश खबर सुनाएं,
सुनके जिसे आप भी फूले न समाएं,
हम बर्बाद हो गए, आपकी बद्दुआ से,
अब आप रकीबों के संग जश्न मनाएं।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" M-074

25.9.23

P- 222 ये तो मुमकिन है

ये तो मुमकिन है कोई नज़र से गिर जाए,
पर ज़रूरी नहीं बुख़ार के जैसे उतर जाए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-222

24.9.23

Q-134 ये दुनियाँ बहुत

ये दुनियां बहुत बदल चुकी है अब,

मेरे दिल तू भी वक्त रहते बदल जा।

बदलना तो पड़ेगा तुझे भी एक दिन,

आज बदल, या फिर कल बदल जा। Q-134





22.9.23

P-221 बहुत दिनों से

बहुत दिनों से कुछ नया लिखा नहीं है,
शायद कोई ज़ख़्म नया मिला नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-221

15.9.23

G-015 दिल अगर नाज़ुक

दिल अगर नाज़ुक है, तो धड़कता क्यों है।
अगर है ये पत्थर, तो फिर तड़पता क्यों है।

टूटना है इसको, तो टूट क्यों नहीं जाता ये,
इश्क की आग में पैहम, सुलगता क्यों है ।

बेवफ़ा जो कोई रुलाऐ धार-धार दिल को,
उसीके तसव्वुर में इतना ये चहकता क्यों है।

मुरझा जाते हैं उम्मीदों के फूल जब दिल में,
तो फिर इतनी देर तक ये महकता क्यों है।

बेवफ़ाई-ओ-रुसवाई तो करते हैं इश्क़ वाले,
सज़ा मगर मासूम दिल ही भुगतता क्यों है।

ना ज़िद तोड़ते है, ना पशेमाँ होते हैं लोग,
तो इश्क़ में हर बार दिल ही झुकता क्यों है।

तोड़के रिश्ते, इंसां तो बैठ जाता है सुकूँ से,
पर दिल बेचारा रह-रहके सिसकता क्यों है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-015

S-283 जाने कितने ख्याल

जाने कितने ख्याल दिल मे आए, और आते चले गए,
पर हम हैं कि हक़ीक़तों से ही रिश्ता निभाते चले गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-283

13.9.23

Q-133 तुम न अब समेट

तुम न अब समेट पाओगे मुझे,
कुछ इस तराह टूटके बिखर गया हूँ।
तुम न बदल पाओगे वो हालात,
अब तलक जिनसे मैं गुज़र गया हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-133


12.9.23

P-220 कितनी खुशफहमियाँ

कितनी ख़ुशफ़हमियाँ हर रोज़ पाल लेते हैं हम,
अपने हिसाब से बातों का अर्थ निकाल लेते हैं हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-220

K-011 देश मे सामाजिक न्याय

             ---भविष्य में---
देश मे सामाजिक न्याय तभी होगा,
जब गरीब का नेता कोई गरीब ही होगा।

देश से भ्रष्टाचार खत्म तभी होगा,
जब चुनाव में भ्रष्ट उम्मीदवार नहीं होगा।

'नारी-सशक्तिकरण' का अर्थ नहीं होगा,
अगर अबला का सशक्तिकरण नहीं होगा।

काम खुद पर अंकुश लगाने से ही होगा,
संविधान-संविधान चिल्लाने से नहीं होगा।

विदेशों में देश-सम्मान प्रशंसा से ही होगा,
देश पे कींचड़ उछालने से कभी नहीं होगा।

सरकारों का आंकलन कार्यों से ही होगा,
अब आगे टीवी पर विज्ञापनों से नहीं होगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-011





8.9.23

S-282 मुझे यकीन है

मुझे यक़ीन है बेवफ़ा हरगिज़ नहीं हो तुम,
डर यही है मुब्तला किसी मुसीबत में हो तुम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-282

7.9.23

T-034 अब तो ये आंखें

अब तो येआंखें भी हैं पथराई,
रास्ते भी पूछने लगे हैं मुझसे,
किसका रस्ता देख रहे हो भाई!

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-034

4.9.23

S-281 मत बना लीजिए

मत बना लीजिए किसी को अपनी आदत,
ये आदतें भी किसी नशे से कम नहीं होतीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-281

1.9.23

Q-132 दूर हूँ उससे

दूर हूँ उससे, मगर मैं उससे जुदा नहीं,
येभी सच है मैं उसका कोई सगा नहीं,
उसे भी है कुछ-कुछ प्यार सा मुझसे, 
पर उसने अभी तक मुझसे कहा नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-132

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...