15.9.23

G-015 दिल अगर नाज़ुक

दिल अगर नाज़ुक है, तो धड़कता क्यों है।
अगर है ये पत्थर, तो फिर तड़पता क्यों है।

टूटना है इसको, तो टूट क्यों नहीं जाता ये,
इश्क की आग में पैहम, सुलगता क्यों है ।

बेवफ़ा जो कोई रुलाऐ धार-धार दिल को,
उसीके तसव्वुर में इतना ये चहकता क्यों है।

मुरझा जाते हैं उम्मीदों के फूल जब दिल में,
तो फिर इतनी देर तक ये महकता क्यों है।

बेवफ़ाई-ओ-रुसवाई तो करते हैं इश्क़ वाले,
सज़ा मगर मासूम दिल ही भुगतता क्यों है।

ना ज़िद तोड़ते है, ना पशेमाँ होते हैं लोग,
तो इश्क़ में हर बार दिल ही झुकता क्यों है।

तोड़के रिश्ते, इंसां तो बैठ जाता है सुकूँ से,
पर दिल बेचारा रह-रहके सिसकता क्यों है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-015

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...