7.9.23

T-034 अब तो ये आंखें

अब तो येआंखें भी हैं पथराई,
रास्ते भी पूछने लगे हैं मुझसे,
किसका रस्ता देख रहे हो भाई!

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-034

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...