27.7.23

Q-127 जलते चराग़ रास

जलते चराग़ रास नहीं आते तो,
लौ कम कर दो बुझाओ तो मत।
दिल तोड़ना ही है तो तोड़ डालो,
बारहा मेरा दिल दुखाओ तो मत।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-127

24.7.23

M-070 माथे पर लाल बिंदी

माथे पर लाल बिंदी, होठों पर हल्की सी मुस्कान,
आंखें नशीली, भंवें नुकीली, लगतीं तीर कमान,
सुराहीदार गर्दन, मनोहरी चंचल चितवन उसकी,
मेरे दिलबर की है बस इतनी संक्षिप्त सी पहचान।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-070

22.7.23

G-013 वफ़ा, बे-वफ़ा

वफ़ा, बे-वफ़ा हो गई।
ज़िन्दगी  क़ज़ा हो गई।

मुहब्बत    दोतरफ़ा से,
अब इकतरफ़ा हो गई।

इतना बदल गया मंज़र,
फ़िज़ा,  ख़िज़ा हो गई।

आबाद  हो गए दुश्मन,
दोस्ती   फ़नाह हो गई।

हम हो रहे हैं उम्रदराज़, 
पर हसरत जवां हो गई।

जहां भी रुक गये कदम,
अपनी मंज़िल वहां हो गई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-013



18.7.23

M-069 संभवतः काल्पनिक थीं

संभवतः काल्पनिक थीं मेरी ख़ुशियाँ,
अकारण जो प्रिय लगने लगी दुनियाँ, 
मृगतृष्णा थी वे शायद कुछ वक्त की,
या फिर वो थीं मेरी ही ग़लतफ़हमियां।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-069

16.7.23

Q-126 वीराने ही वीराने

वीराने ही वीराने पसरे थे जहां,
अब बहारों का आलम है वहां,
ऐसा कौन आगया चमन मे कि,
रंगीं नज़ारों का आलम है यहां।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-126

15.7.23

S-274 यूँ तो पत्थरों में

यूं तो पत्थरों में भी कुछ पत्थर कीमती पत्थर होते हैं,
पर इंसानों में तो लोग अक्सर पत्थर से भी बत्तर होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-274

7.7.23

M-068 सीमा में प्रेम

सीमा में प्रेम, सीमा में त्याग,
सीमा मे द्वेष, सीमा में वैराग,
जब-जब सीमाएं लांघी गईं,
हुआ है सुकूँ का परित्याग।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-068


Q-125 उम्र पूरी बीत जाती

उम्र पूरी बीत जाती है सिर्फ़ तजुर्बे करने में,
वक़्त कहाँ मिलता है उनसे सीखने के लिए।
काश ! ज़िन्दगियाँ भी दो-दो हुआ करतीं ,
एक समझने के लिए, एक जीने के लिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-125

4.7.23

Q-124 दुनियाँ याद करती

दुनियां याद करती है तो करती रहे,
पत्थर दिलों को हिचकी आती नहीं।
ख़ुश्क चेहरों से क्या उम्मीदे-ख़ुशी,
उनके होठों पे हंसी कभी आती नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-124

2.7.23

Q-123 यूंतो जलता चराग़

यूंतो जलता चराग़ हूँ पर बुझा-बुझा सा रहता हूँ मैं,
रोशनी देकर भी अंधेरों से डरा-डरा सा रहता हूँ मैं,
मुख़्तसर सी  मोहलत मुझको  देते हैं आंधी तूफ़ान,
वर्ना तो रातभर सहमा टिम-टिमाता सा रहता हूँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-123

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...