वफ़ा, बे-वफ़ा हो गई।
ज़िन्दगी क़ज़ा हो गई।
ज़िन्दगी क़ज़ा हो गई।
मुहब्बत दोतरफ़ा से,
अब इकतरफ़ा हो गई।
इतना बदल गया मंज़र,
फ़िज़ा, ख़िज़ा हो गई।
आबाद हो गए दुश्मन,
दोस्ती फ़नाह हो गई।
हम हो रहे हैं उम्रदराज़,
पर हसरत जवां हो गई।
जहां भी रुक गये कदम,
अपनी मंज़िल वहां हो गई।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-013
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