संभवतः काल्पनिक थीं मेरी ख़ुशियाँ,
अकारण जो प्रिय लगने लगी दुनियाँ,
मृगतृष्णा थी वे शायद कुछ वक्त की,
या फिर वो थीं मेरी ही ग़लतफ़हमियां।
अकारण जो प्रिय लगने लगी दुनियाँ,
मृगतृष्णा थी वे शायद कुछ वक्त की,
या फिर वो थीं मेरी ही ग़लतफ़हमियां।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-069
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