कभी लफ्ज़ नहीं मिलते,
कभी ज़ुबाँ नहीं खुलती।
ख़ामोश सी मुहब्बत की,
ऐसी मिसाल नहीं मिलती।
कभी ज़ुबाँ नहीं खुलती।
ख़ामोश सी मुहब्बत की,
ऐसी मिसाल नहीं मिलती।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" M-039
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...