16.9.22

S-170 नाज़ुक फूल

नाज़ुक फूल होने में कैसा फख्र,
कांटें अच्छे जो टूटके मुरझाते नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-170

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...