23.9.21

P-005 कितना छोटा सा

कितना छोटा सा होता है ये दिमाग़, फिर भी,
न जाने कितनी ग़लतफ़हमियां पाले रहता है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-005

18.9.21

P-004 शर्म बड़ी कीमती

शर्म बड़ी कीमती चीज़ होती है, 
कम ही लोगों के पास  होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-004

4.9.21

P-003 कुछ दलों को

कुछ दलों को करनी थी गरीबों की मदद,
इसलिए उन्होंने ठप्प करके रक्खी
संसद। 

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-003
 

P-002 संसद तो बन्द

संसद तो बंद है, हंगामा कहाँ किया जाय,
चलो, सड़कों पर ही क्यों ना किया जाय। 

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-002
 

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...