18.9.21

P-004 शर्म बड़ी कीमती

शर्म बड़ी कीमती चीज़ होती है, 
कम ही लोगों के पास  होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-004

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...