23.9.21

P-005 कितना छोटा सा

कितना छोटा सा होता है ये दिमाग़, फिर भी,
न जाने कितनी ग़लतफ़हमियां पाले रहता है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-005

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...