कट गए हैं पंख मेरे, मगर मैं मोहताज नहीं,
चल तो सकता हूँ, क्या हुआ जो परवाज़ नहीं।
- वीरेंद्र सिन्हा “अजनबी“ S-142
चल तो सकता हूँ, क्या हुआ जो परवाज़ नहीं।
- वीरेंद्र सिन्हा “अजनबी“ S-142
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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