हक़ीक़तों में और जी नहीं सकते,
ख़्वाबों में हमेशा रह नहीं सकते,
धरती छोड़के जाएं तो जाएं कहाँ,
आकाश में बसेरा कर नहीं सकते।
ख़्वाबों में हमेशा रह नहीं सकते,
धरती छोड़के जाएं तो जाएं कहाँ,
आकाश में बसेरा कर नहीं सकते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-036
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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