जानते हो दिल समझेगा नहीं,
फिर उसको समझाते क्यों हो।
भूल चुके हो तुम मुझको,
बार बार ये उसे रटवाते क्यों हो।
फिर उसको समझाते क्यों हो।
भूल चुके हो तुम मुझको,
बार बार ये उसे रटवाते क्यों हो।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-067
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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