मुहब्बत को उतना ही समझा जितना तूने समझाया हमें,
उसके आगे क्या था, तन्हा होकर ही समझ में आया हमें।
उसके आगे क्या था, तन्हा होकर ही समझ में आया हमें।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-138
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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