3.6.22

M-034 कभी उनकी आंखों

कभी  उनकी आंखों में बसते हैं हम,
कभी उन्हीं आंखों में खटकते हैं हम,
ये कैसा पैमाना हैं उनकी आंखों का,
कभी दोस्त कभी दुश्मन लगते हैं हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-034

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...