कौन करवाएगा चुप, अब मुझको,
मैंने तो ख़ुद को ही ख़ुद रुलाया है।
तुमने दे दिए, तो तुम ही मिटाओगे,
ज़ख्मों को आसरा, अब तुम्हारा है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-063
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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