9.5.22

S-125 कितनी मिलावट

कितनी मिलावट होने लगी है आज तिजारत-ऐ-इश्क़ में,
ऊपर-ऊपर मोहब्बतें, अंदर नफ़रतें ही नफ़रतें भरी पड़ी हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-125

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...