वो दिलकश मंज़र कितना हसीन होता,
गर होता असल, महज़ ख्वाब न रंगीन होता।
गर होता असल, महज़ ख्वाब न रंगीन होता।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-117
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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