14.5.22

M-031 क्या चीज़ थी

क्या चीज़ थी वो तंगदस्ती भी,
पा नहीं सकती आज बड़ी हस्ती भी।
छोटी बातें, अचानक मुलाकातें,
महलों जैसी थी वो तंग बस्ती भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-031

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...