ऊपर वाले ने तय किया है जो, उसको कैसे बदल दोगे,
मेरा नाम तो बदल दोगे, मगर मुझको कैसे बदल दोगे।
मेरा नाम तो बदल दोगे, मगर मुझको कैसे बदल दोगे।
न बदलेगी मेरी शक्ल, न बदलेगी मेरी चाल,
जो भी लेकर आया हूँ वहां से, उसको कैसे बदल दोगे।
माना, तुम बदल दोगे मेरा पहरावा, तौर तरीके,
मगर मुझमें बह रहा है जो खूँ, उसको कैसे बदल दोगे।
फिर भी ता-उम्र मैं रहूंगा इन्सान वही का वही,
तुम मेरे अंदरूनी रूप, मेरे DNA को कैसे बदल दोगे।
मज़हब हो कोई सा भी, कुदरत तो एक ही है,
सबको रहना यहीं है, तुम दुनियां को कैसे बदल दोगे।
तुम नहीं हो लिखने वाले मुकद्दर या मुस्तकबिल,
ज़रा मुझे ये समझाओ मेरे नसीब को कैसे बदल दोगे।
हयातो-मौत पर बस नहीं चला है किसी का,
तुम इंसाँ हो, बस मेरे अंदाज़े-रुखसती को बदल दोगे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-002
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