वो दिन कहाँ गए, जब गिले दूर करने में घंटों कट जाया करते थे,
हम-मिज़ाजी हम-ख्याली ने बना दी ज़िन्दगी बद-ज़ायका अब,
कहाँ गए हंसीं इल्ज़ाम उनके, जो हम पर वो लगाया करते थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-001
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
वो दिन कहाँ गए, जब गिले दूर करने में घंटों कट जाया करते थे,
हम-मिज़ाजी हम-ख्याली ने बना दी ज़िन्दगी बद-ज़ायका अब,
कहाँ गए हंसीं इल्ज़ाम उनके, जो हम पर वो लगाया करते थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-001
वो तो फ़ारिग हो गया ज़ुल्म करके,
अब 'ज़ुल्मे-वक्त' की बारी आई है।
आंसू तो बह के निकल गए आंख से,
अब आंखें पथराने की बारी आई है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-006
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...