19.10.21

T-001 वो दिन कहाँ

वो दिन कहाँ गए, जब गिले दूर करने में घंटों कट जाया करते थे, 

हम-मिज़ाजी हम-ख्याली ने बना दी ज़िन्दगी बद-ज़ायका अब,


कहाँ गए हंसीं इल्ज़ाम उनके, जो हम पर वो लगाया करते थे।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  T-001


7.10.21

G-002 ऊपर वाले ने

ऊपर वाले ने तय किया है जो, उसको कैसे बदल दोगे,
मेरा नाम तो बदल दोगे,  मगर मुझको कैसे बदल दोगे।

न बदलेगी मेरी शक्ल, न बदलेगी मेरी चाल,
जो भी लेकर आया हूँ वहां से, उसको कैसे बदल दोगे।

माना, तुम बदल दोगे मेरा पहरावा, तौर तरीके,
मगर मुझमें बह रहा है जो खूँ, उसको कैसे बदल दोगे।

फिर भी ता-उम्र मैं रहूंगा इन्सान वही का वही,
तुम मेरे अंदरूनी  रूप, मेरे DNA को कैसे बदल दोगे।

मज़हब हो कोई सा भी, कुदरत तो एक ही है,
सबको रहना यहीं है, तुम दुनियां को कैसे बदल दोगे।

तुम नहीं हो लिखने वाले मुकद्दर या मुस्तकबिल,
ज़रा मुझे ये समझाओ मेरे नसीब को कैसे बदल दोगे।

हयातो-मौत पर बस नहीं चला है किसी का,
तुम इंसाँ हो, बस मेरे अंदाज़े-रुखसती को बदल दोगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-002
 

3.10.21

M-006 वो तो फ़ारिग हो गया

वो तो फ़ारिग हो गया ज़ुल्म करके,

अब 'ज़ुल्मे-वक्त' की बारी आई है।

आंसू तो बह के निकल गए आंख से,

अब आंखें पथराने की बारी आई है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-006


K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...