मंज़िल मिल ही जाए ये ज़रूरी नहीं,
मगर इसकी जुस्तजू छोड़ी नहीं जाती।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-219
मगर इसकी जुस्तजू छोड़ी नहीं जाती।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-219
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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