बामुश्किल चली थी एक बादे-सबा,
मुकद्दर ने उसका रुख भी मोड़ दिया।
मुकद्दर ने उसका रुख भी मोड़ दिया।
संभाले बैठे थे टूटेफूटे दिल को भी हम,
आज बेवफ़ा ने रहे-सहे को भी तोड़ दिया।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-074
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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