25.8.22

Q-074 बामुश्किल चली थी

बामुश्किल चली थी एक बादे-सबा,
मुकद्दर ने उसका रुख भी मोड़ दिया।
संभाले बैठे थे टूटेफूटे दिल को भी हम,
आज बेवफ़ा ने रहे-सहे को भी तोड़ दिया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-074

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