मैं बड़ा खुशनसीब हूँ, मेरे पास कितनी तन्हाई है,
वरना भीड़ से घिरे लोग तो ज़रा सी को तरसते हैं।
वरना भीड़ से घिरे लोग तो ज़रा सी को तरसते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-154
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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