1.6.22

P-097 जी तो बहुत

जी तो बहुत करता है कि नेक इंसाँ बनूं,
पर  है कौन यहां, जिसके संग एक इंसाँ बनूं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-097

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...