मैं जब भी कोई पत्ता सूखकर गिरता देखता हूँ,
अपने उजड़े हुए चमन को बहुत याद करता हूँ।
अपने उजड़े हुए चमन को बहुत याद करता हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-081
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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