5.3.22

M-027 इंसाँ अकेला

 इंसाँ अकेला ही जी रहा है,
और अकेला ही मर रहा है,
ये न कहो लोग बदल रहे हैं,
यह तो युग ही बदल रहा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-027

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