14.6.24

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में,
चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में।

पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ,

मौसम बदल कर 'सूखा' कर दूं, सावन में।


नदियों झरनों सरोवरों को दूषित कर डालूं

प्रदूषण का ज़हर फैला दूँ सारे आलम में।


मैं कुदरत के स्रोतों का संतुलन बिगाड़ दूँ,

परवाह न करूँ भविष्य की अपने आनंद में।


मै प्रकृति का शत्रु स्वार्थी इंसान जो ठहरा,

प्रकृति को बांधना चाहूँ अपने ही बंधन में।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-007

31.5.24

M-118 क्यों डरता हूँ

क्यों डरता हूँ मैं तुम्हे खोने से,
जबकि तुम्हे मैंने पाया ही कहाँ है?
तुम क्या जानो विरह की पीड़ा,
तुमने अभी मुझे खोया ही कहाँ है?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-118

29.5.24

Q-204 और क्या सौगात

और क्या सौगात देगा वो मुझे,
दर्द जो दिया है वो कम नहीं है।
बहुत याद रख लिया मैंने उसे,
और याद रखने का दम नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-204










26.5.24

Q-055 आज जो मुझे

आज जो मुझे मुस्कुराते देख लिया,
बस इसी बात से नाराज़ है ज़िन्दगी।
कितनी ख्वाहिशों को मैंने दबा दिया,
पर फिर भी मुझसे नाराज़ है ज़िन्दगी।   

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-055

Q-203 ख़ुदा की नियामत

खुदा की नियामत हैं, इनको बोझ न समझो,
बड़ी मेहनत का फल हैं इन्हें बोझ न समझो,
छुपा कर रखो इन बेशकीमती अमानतों को,
नुमाइश करने का इनको सामान न समझो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-203

24.5.24

Q-202 ख़ुदा सुंदर नहीं

ख़ुदा सुंदर नहीं बनाता किसी को,
ये तो उसके चाहने वाले बना देते हैं।
कोई इंसाँन हो मामूली चाहे जितना,
अहम तो उसको मुरीद बना देते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-202

Q-201 मेरे 'अपने' हर हाल में

 मेरे 'अपने' हर हाल में, मेरे हाल जान लेते हैं।
मेरी मुस्कुराहट में भी मेरा दर्द पहचान लेते हैं।
बात को कितना भी घुमाफिरा कर पेश कर दूँ,
वो ज़हीन जो ठहरे सही मतलब जान लेते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-201

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...