20.6.22

Q-072 न हमारे निशां

न हमारे निशां रहे ना हमीं रहे,
न मकाँ रहे और ना मकीं रहे,
बदल गए सब ही के किरदार,
जो हमनशीं थे वे ना कहीं रहे।

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-072

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...