वो मुहब्बत ही क्या जिसमे थोड़ी सी बेवफ़ाई न हो,
वो इश्क़ ही क्या जिसमे कभी थोड़ी सी जुदाई न हो,
मुहब्बत की पायेदारी कैसे साबित की जाएगी भला,
अगर एक बार उसमें कभी थोड़ी सी रुसवाई न हो।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-071
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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