इतने भी कांटे ना बिछाओ मेरे रास्तों में,
तुम्हे भी चलना पड़ सकता है उन्ही राहों में।
तुम्हे भी चलना पड़ सकता है उन्ही राहों में।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-104
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment